Sunday, February 1, 2009

मंगलोर pub आतंक

मित्रो...
हद है हमारी नपुंसकता की... सच कह रहा हू हद है... हम तालिबानी मानसिकता के शिकार कुछ कुंठित गुंडों (जिनको यह लगता है की वो इस देश को खाकी निकर पहना कर चलाएंगे, और जिन्हें ये भी नही पता की हिंदू समाज में लड़कियों/महिलाओं की क्या स्थिति थी.... काश !! की कोई इन नासमझ लोगो को इतिहास का थोड़ा भी ज्ञान करा देता...) के आगे घुटने टेक रहे है।
बंधु, इस देश में महिलाओ की स्वनंत्रता कभी भी बाधित नही रही (इस देश के गुलाम होने से पहले) पहले के ज़माने में pub नही होते थे... पर महिलाओ को, लड़कियो को पूरी स्वंत्रता थी की वो जो मन करे... शायद ये ही वो पहला सभ्य देश/समाज था जिसने महिलाओ को पुरुषों के सामान अधिक दिए थे और जिन्हें वो समाज का एक बराबरी का हिस्सा मानता था। अपने से (मर्दों से) किसी भी तेरह कमतर नही....
फ़िर आज जब हम २१ शताब्दी में है ये भावना किधर से आई को लड़कियों का नाच, उनका अपने पुरूष मित्रो से मिलना उनके साथ बैठना या नाचना हमारी सभ्यता के लिए कलंक है?
कौन है इस सोच का जिम्मेदार???

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